छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता एक गंभीर संकट से गुजर रही है। संकट संसाधनों का नहीं, संकट पहचान का है। कौन पत्रकार है और कौन पत्रकार होने का नाटक कर रहा है—यह फर्क तेजी से मिटाया जा रहा है। और जब यह फर्क मिटता है, तब सबसे ज़्यादा नुकसान सच लिखने और दिखाने वालों को होता है। राजधानी रायपुर से सामने आया ताजा मामला इसी का उदाहरण है।
सिविल लाइन थाना क्षेत्र के ताज नगर चौकी में दो पड़ोसियों के बीच हुए विवाद को शांत करने पहुंची पुलिस पर आरोप लगाने के लिए एक युवक पत्रकार बनकर थाने जा पहुंचा। घटना के दौरान धक्का-मुक्की में एक 11 वर्षीय बच्चे को मामूली चोट लगी थी। मामला स्थानीय स्तर पर निपट सकता था, लेकिन इसे मुद्दा बनाकर थाने में हंगामा खड़ा करने की कोशिश की गई।

खुद को पत्रकार बताने वाला हाशिम अख्तर, दो ऐसे युवकों के साथ थाने पहुंचा जिनका आपराधिक इतिहास रहा है। ऑन ड्यूटी कांस्टेबल को धमकाया गया—“देख लूंगा”—और फिर कैमरा निकालकर वीडियो बनाया गया। उद्देश्य साफ था: सोशल मीडिया के जरिए दबाव बनाना, बदनामी फैलाना और वर्दी को कटघरे में खड़ा करना। यह पत्रकारिता नहीं है। यह प्रेशर पॉलिटिक्स है।

विडंबना यह है कि जो युवक कानून का उल्लंघन दिखाकर नैतिकता का पाठ पढ़ा रहा था, वही खुद यातायात नियमों का खुलेआम उल्लंघन करता पाया गया। उसकी मोटरसाइकिल के चालान पेंडिंग हैं, पीयूसी एक्सपायर्ड है और हाई सिक्योरिटी नंबर प्लेट तक मौजूद नहीं है। सवाल यह नहीं है कि पुलिस निर्दोष है या दोषी। सवाल यह है कि जांच का अधिकार किसे है और दबाव बनाने का हथियार किसे मिल गया है। मोबाइल फोन पत्रकारिता का औजार हो सकता है, लेकिन वह प्रमाणपत्र नहीं है। पत्रकार होना मतलब सवाल पूछना, जवाबदेही तय करना और तथ्य के साथ खड़ा होना। धमकी देना, वीडियो काटकर पोस्ट करना और ट्रायल चलाना—यह पत्रकारिता नहीं, यह अराजकता है।

 

अगर हर व्यक्ति कैमरा लेकर खुद को प्रेस घोषित करने लगेगा, तो न पुलिस बचेगी, न पत्रकारिता। और अंततः भरोसा भी नहीं बचेगा। अब वक्त आ गया है कि सरकार, प्रशासन और स्वयं मीडिया संस्थान तय करें— पत्रकार कौन है और फर्जीपन की कीमत क्या होगी। क्योंकि अगर यह सीमा आज तय नहीं हुई, तो कल असली पत्रकार भी कटघरे में खड़े होंगे—बिना कसूर।

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